गुरुवार, 2 जून 2016

हड़प्पा सभ्यता:माप-तौल

हड़प्पा सभ्यता:माप-तौल

लिपि का ज्ञान हो जाने के कारण निजी सम्पत्ति का लेखा-जोखा आसान हो गया । व्यापार के लिए उन्हें माप तौल की आवश्यकता हुई और उन्होने इसका प्रयोग भी किया । बाट के तरह की कई वस्तुए मिली हैं । उनसे पता चलता है कि तौल में 16 या उसके आवर्तकों (जैसे – 16, 32, 48, 64, 160, 320, 640, 1280 इत्यादि) का उपयोग होता था । दिलचस्प बात ये है कि आधुनिक काल तक भारत में 1 रूपया 16 आने का होता था । 1 किलो में 4 पाव होते थे और हर पाव में 4 कनवां यानि एक किलो में कुल 16 कनवां ।

हड़प्पा सभ्यता:लिपि

हड़प्पा सभ्यता:लिपि

प्राचीन मेसोपोटामिया की तरह यहां के लोगों ने भी लेखन कला का आविष्कार किया था । हड़प्पाई लिपि का पहला नमूना 1853 ईस्वी में मिला था और 1923 में पूरी लिपि प्रकाश में आई परन्तु अब तक पढ़ी नहीं जा सकी है।

हड़प्पा सभ्यता :पुरुष देवता

हड़प्पा सभ्यता :पुरुष देवता

यहां मिले एक सील पर एक पुरुष देवता का चित्र मिला है । उसके सिर पर तीन सींग है और वह योगी की मुद्रा में पद्मासन में बैठा है । उसके चारों ओर एक हाथी, एक गैंडा और एक बाघ है तथा आसन के नीचे एक भैंसा और पांवों के पास दो हिरण हैं । इसकी छवि पौराणिक पशुपति महादेव से मिलती है । यहां पर लिंग पूजा का भी प्रचलन था और कई जगहों पर पत्थरों के बने लिंग तथा योनि पाए गए हैं । ऋग्वेद में लिंग पूजक अनार्य जातियों की चर्चा है ।
यहां के लोग वृक्ष पूजक भी थे । एक मृन्मुद्रा में पीपल की डालों के बीच में विराजमान देवता चित्रित हैं । इस वृक्, की पूजा आजतक जारी है । पशु-पूजा में भी इनका विश्वास था ।
अपने समकालीन मिस्री सभ्यता के विपरीत सिन्धु घाटी सभ्यता में किसी मंदिर का प्रमाण नहीं मिलता है ।

हड़प्पा सभ्यता:धर्म

हड़प्पा सभ्यता:धर्म

हड़प्पा में पकी मिट्टी की स्त्री मूर्तिकाएं भारी संख्या में मिली हैं । एक मूर्ति में स्त्री के गर्भ से निकलता एक पौधा दिखाया गया है । विद्वानों के मत में यह पृथ्वी देवी की प्रतिमा है और इसका निकट संबंध पौधों के जन्म और वृद्धि से रहा होगा । इसलिए मालूम होता है कि यहां के लोग धरती को उर्वरता की देवी समझते थे और इसकी पूजा उसी तरह करते थे जिस तरह मिस्र के लोग नील नदी की देवी आइसिस् की । लेकिन प्राचीन मिस्र की तरह यहां का समाज भी मातृ प्रधान था कि नहीं यह कहना मुश्किल है । कुछ वैदिक सूक्तों में पृथ्वी माता की स्तुति है, किन्तु उनकों कोई प्रमुखता नहीं दी गई है । कालान्तर में ही हिन्दू धर्म में मातृदेवी को उच्च स्थान मिला है । ईसा की छठी सदी और उसके बाद से ही दुर्गा, अम्बा, चंडी आदि देवियों को आराध्य देवियों का स्थान मिला ।

हड़प्पा सभ्यता : राजनैतिक ढांचा

हड़प्पा सभ्यता : राजनैतिक ढांचा

इतना तो स्पष्ट है कि हड़प्पा की विकसित नगर निर्माण प्रणाली, विशाल सार्वजनिक स्नानागारों का अस्तित्व और विदेशों से व्यापारिक संबंध किसी बड़ी राजनैतिक सत्ता के बिना नहीं हुआ होगा पर इसके पुख्ता प्रमाण नहीं मिले हैं कि यहां के शासक कैसे थे और शासन प्रणाली का स्वरूप क्या था ।

हड़प्पा सभ्यता:व्यापार

हड़प्पा सभ्यता:व्यापार

यहां के लोग आपस में पत्थर, धातु शल्क (हड्डी) आदि का व्यापार करते थे । एक बड़े भूभाग में ढेर सारी सील (मृन्मुद्रा), एकरूप लिपि और मानकीकृत माप तौल के प्रमाण मिले हैं । वे चक्के से परिचित थे और संभवतः आजकल के इक्के (रथ) जैसा कोई वाहन प्रयोग करते थे । ये अफ़ग़ानिस्तान और ईरान (फ़ारस) से व्यापार करते थे । उन्होने उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान में एक वाणिज्यिक उपनिवेश स्थापित किया जिससे उन्हें व्यापार में सहूलियत होती थी । बहुत सी हड़प्पाई सील मेसोपोटामिया में मिली हैं जिनसे लगता है कि मेसोपोटामिया से भी उनका व्यापार सम्बंध था । मेसोपोटामिया के अभिलेखों में मेलुहा के साथ व्यापार के प्रमाण मिले हैं साथ ही दो मध्यवर्ती व्यापार केन्द्रों का भी उल्लेख मिलता है – दलमुन और माकन । दिलमुन की पहचान शायद फ़ारस की खाड़ी के बहरीन के की जा सकती है ।

हड़प्पा सभ्यता:पशुपालन

हड़प्पा सभ्यता:पशुपालन

हड़प्पा योंतो एक कृषि प्रधान संस्कृति थी पर यहां के लोग पशुपालन भी करते थे । बैल-गाय, भैंस, बकरी, भेंड़ और सूअर पाला जाता था . यहां के लोगों को कूबड़ वाला सांड विशेष प्रिय था । कुत्ते शुरू से ही पालतू जानवरों में से एक थे । बिल्ली भी पाली जाती थी । कुत्ता और बिल्ली दोनों के पैरों के निशान मिले हैं । लोग गधे और ऊंट भी रखते थे और शायद इनपर बोझा ढोते थे । घोड़े के अस्तित्व के संकेत मोहेंजोदड़ो की एक ऊपरी सतह से तथा लोथल में मिले एक संदिग्ध मूर्तिका से मिले हैं । हड़प्पाई लोगों को हाथी तथा गैंडे का ज्ञान था ।

हड़प्पा सभ्यता की कृषि ( Agriculture system of Indus Valley)

कृषि

आज के मुकाबले सिन्धु प्रदेश पूर्व में बहुत ऊपजाऊ था । ईसा-पूर्व चौथी सदी में सिकन्दर के एक इतिदासकार ने कहा था कि सिन्ध इस देश के ऊपजाऊ क्षेत्रों में गिना जाता था । पूर्व काल में प्राकृतिक वनस्पति बहुत थीं जिसके कारण यहां अच्छी वर्षा होती थी । यहां के वनों से ईंटे पकाने और इमारत बनाने के लिए लकड़ी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल में लाई गई जिसके कारण धीरे धीरे वनों का विस्तार सिमटता गया । सिन्धु की उर्वरता का एक कारण सिन्धु नदी से प्रतिवर्ष आने वाली बाढ़ भी थी । गांव की रक्षा के लिए खड़ी पकी ईंट की दीवार इंगित करती है बाढ़ हर साल आती थी । यहां के लोग बाढ़ के उतर जाने के बाद नवम्बर के महीने में बाढ़ वाले मैदानों में बीज बो देते थे और अगली बाढ़ के आने से पहले अप्रील के महीने में गेँहू और जौ की फ़सल काट लेते थे । यहां कोई फावड़ा या फाल तो नहीं मिला है लेकिन कालीबंगां की प्राक्-हड़प्पा सभ्यता के जो कूँट (हलरेखा) मिले हैं उनसे आभास होता है कि राजस्थान में इस काल में हल जोते जाते थे ।
सिन्धु घाटी सभ्यता के लोग गेंहू, जौ, राई, मटर आदि अनाज पैदा करते थे । वे दो किस्म की गेँहू पैदा करते थे । बनावली में मिला जौ उन्नत किस्म का है । इसके अलावा वे तिल और सरसों भी उपजाते थे । सबसे पहले कपास भी यहीं पैदा की गई । इसी के नाम पर यूनान के लोग इस सिन्डन (Sindon) कहने लगे ।

शनिवार, 28 मई 2016

CBSE Class 10th result 2016

CBSE Class 10th result 2016: सीबीएसई बोर्ड की 10 कक्षा का परीक्षा परिणाम  आज , यहां देखें रिजल्‍ट
सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (सीबीएसई) की 10वीं कक्षा का परीक्षा परिणाम आज शनिवार (28 मई ) को जारी किया जाएगा। बोर्ड सूत्रों के अनुसार, परीक्षा परिणाम आज दोपहर 2 बजे तक जारी किया जा सकता है। आज दोपहर तक क्लास 10 के रिजल्ट ऑनलाइन घोषित हो जाने की उम्मीद है।
सीबीएसई की 10वीं कक्षा की परीक्षा में बैठे छात्र अपना परीक्षा परिणाम बोर्ड की आधिकारिक वेबसाइट www.cbse.nic.in, www.cbseresults.nic.in पर लॉग ऑन कर देख सकते हैं। बोर्ड की ऑफिशियल वेबसाइट के अलावा छात्र अपने नतीजे एसएमएस के जरिए भी प्राप्‍त कर सकते हैं।
गौर हो कि इस साल 10वीं की परीक्षा 1 मार्च से 28 मार्च तक चली थी। देशभर में अपने परीक्षा परिणाम का इंतजार कर रहे 10वीं कक्षा के छात्रों का इंतजार आज खत्म हो सकता है। इस बार 14,99,122 छात्रों ने सीबीएसई 10वीं का एग्जाम दिया था, जिसमें से 8.92,685 लड़के और 6,06,437 लड़कियां शामिल थीं। बोर्ड के सभी रीजन के रिजल्ट आज ही घोषित हो जाएंगे।

भारत में भूकंप (Earthquick in India)

भारत में भूकंप

भारत भूकंप के लिहाज़ से लगातार ज़्यादा संवेदनशील इसलिए भी होता जा रहा है, क्योंकि इसकी सब-कॉन्टिनेंटल प्लेट एशिया के अंदर घुसती चली जा रही है। इससे जब भी सब-कॉन्टिनेंटल प्लेट का दबाव ऐशियन प्लेट पर ब़ढेगा तो नतीजा एक बड़े सैलाब के तौर पर दिखाई देगा। धरती की जो प्लेट्स या परतें जहां-जहां मिलती हैं वहां के आसपास के समुद्र में सुनामी का ख़तरा ज़्यादा होता है।

भूकंप की आशंका के आधार पर देश को पांच जोन में बांटा गया है। उत्तर-पूर्व के सभी राज्य, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड तथा हिमाचल प्रदेश के कुछ हिस्से जोन-5 में आते हैं। यह हिस्सा सबसे ज़्यादा संवेदनशील कहा जा सकता है। उत्तराखंड के कम ऊंचाई वाले हिस्सों से लेकर उत्तर प्रदेश के ज़्यादातर हिस्से और दिल्ली जोन-4 में आते हैं। इन्हें भी कम संवेदनशील नहीं कहा जा सकता है। मध्य भारत अपेक्षाकृत कम खतरे वाले हिस्से जोन-3 में आता है, जबकि दक्षिण भारत के ज़्यादातर हिस्से सीमित खतरे वाले जोन-2 में आते हैं, लेकिन यह एक मोटा वर्गीकरण है। दिल्ली में कुछ इला़के हैं, जो जोन-5 की तरह खतरे वाले हो सकते हैं। इस प्रकार दक्षिण राज्यों में कई स्थान ऐसे हो सकते हैं जो ज़ोन-4 या ज़ोन-5 जैसे खतरे वाले हो सकते हैं। दूसरे ज़ोन-5 में भी कुछ इला़के हो सकते हैं, जहां भूकंप का ख़तरा बहुत कम हो और वे ज़ोन-2 की तरह कम खतरे वाले हों। इस मामले में बिहार ही एक ऐसा राज्य है, जहां लगभग सभी भूकंपीय ज़ोन आते हैं। इसकी जांच के लिए भूकंपीय माइक्रोजोनेशन की ज़रूरत होती है। माइक्रोजोनेशन वह प्रक्रिया है, जिसमें भवनों के पास की मिट्टी को लेकर परीक्षण किया जाता है और इसका पता लगाया जाता है कि वहां भूकंप का ख़तरा कितना है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि भारत और तिब्बत एक-दूसरे की तरफ़ प्रति वर्ष दो सेंटीमीटर की गति से सरक रहे हैं। इस प्रक्रिया से हिमालय क्षेत्र पर दबाव बढ़ रहा है। यही वजह है कि पिछले 200 वर्षों में हिमालय क्षेत्र में छह बड़े भूकंप आ चुके हैं। इनके मुताबिक़ इस दबाव को कम करने का प्रकृति के पास सिर्फ़ एक ही तरीक़ा है और वह है भूकंप। इसलिए भूकंपों को रोकना तो किसी के बस की बात नहीं है, हां इतना ज़रूर है कि इनसे सावधान होकर जानमाल के नुक़सान को कम ज़रूर किया जा सकता है।

सबसे विनाशकारी भूकंप

हाल के वर्षों में भारत में सबसे विनाशकारी भूकंप गुजरात में आया था। 26 जनवरी 2001 को जब राष्ट्रपति राजधानी नई दिल्ली में 52 गणतंत्र दिवस पर सलामी ले रहे थे, तभी वहां से दूर गुजरात में 23.40 अक्षांस और 70.32 देशांतर तथा भूतल में 23.6 किमी. की गहराई पर भूकंप का एक तेज झटका आया। उसने राष्ट्र की उल्लासमय मनःस्थिति को राष्ट्रीय अवसाद में बदल दिया। 15 अगस्त 1950 को असम में आए भूकंप के बाद भारत मे आया यह सबसे तेज भूकंप था। उत्तरी असम में आए 8.5 परिमाण वाले उस भूकंप ने 11,538 लोगों की जान ले ली थी। सन् 1897 में शिलांग के पठार में आए एक अन्य भूकंप का परिमाण 8.7 था। ये दोनों भूकंप इतने तेज थे कि नदियों ने अपने रास्ते बदल दिए। इतना ही नहीं भूमि के उभार में स्थाई तौर पर परिवर्तन आ गया और पत्थर ऊपर की ओर उठ गए।

सावधानियाँ एवं उपाय

भूकम्‍प आने के पहले

भूकम्‍प आने से पहले तैयारी कर लेने से आपके घर और कारोबार को होने वाली क्षति कम करने और आपको जीवित बचने में मदद मिलती है।
एक घरेलू आपातकालीन योजना तैयार करें। अपने घर में अपने आपातकालीन बचाव वस्‍तुएं व्‍यवस्थित करें और इनका सही रखरखाव बनाए रखें, साथ ही एक साथ ले जाने योग्‍य गेटअवे किट (बचाव किट) भी तैयार करें।गिरने, ढंकने और थामने का अभ्‍यास करें।अपने घर में, स्‍कूल या कार्यस्‍थल में सुरक्षित स्‍थलों को पहचानें।सुरक्षा और धनराशि के संदर्भ में अपनी घरेलू बीमा पॉलिसी की जांच करें।यह सुनिश्चित करने के लिए कि आपका घर अपनी नीवों पर सुरक्षित है, किसी योग्‍य विशेषज्ञ से सलाह लें।भारी फर्नीचर वस्‍तुओं को फर्श या दीवार से मज़बूती से जोड कर रखें।

भूकम्‍प आने के दौरान

यदि आप किसी भवन के अंदर हैं, तो कुछ कदम से अधिक न चलें, खुद को गिराएं, ढंकें और थामे रखें। कम्‍पन थम जाने तक अंदर ही रहें और बाहर तभी निकलें जब आप यह निश्चित कर लें कि अब ऐसा करना सुरक्षित है।यदि आप किसी एलिवेटर पर हैं, तो खुद को गिराएं, ढंकें और थामे रखें। कम्‍पन थमने पर नजदीकी फर्श पर जाने की कोशिश करें यदि आप सुरक्षित रूप से ऐसा कर सकें।यदि आप बाहर हैं, तो इमारतों, पेड़ों, स्‍ट्रीटलाइटों और बिजली की लाईनों से कुछ कदम से अधिक दूर न जाएं, फिर खुद को गिराएं, ढंकें और थामे रखें।यदि आप किसी बीच पर तट के निकट हैं, तो खुद को गिराएं, ढंकें और थामे रखें और फिर तत्‍काल ऊंची जमीन की ओर जाएं यदि भूकम्‍प के बाद सुनामी आ रही हो।यदि आप वाहन चला रहे हैं, तो किसी खुली जगह तक जाएं, रूकें और वहीं ठहरें और अपनी सीटबेल्‍ट को तब तक कसे रखें जब तक कि कम्‍पन न थम जाएं। एक बार कम्‍पन थम जाने पर, सावधानीपूर्वक आगे बढ़ें और उन पुलों या ढलानों पर न जाएं जो क्षतिग्रस्‍त हो चुके हो सकते हैं।यदि आप किसी पर्वतीय क्षेत्र में या अस्थिर ढलानों या खड़ी चट्टानों पर हैं, तो मलबा गिरने या भूस्खलन होने के प्रति सचेत रहें।

भूकम्‍प आने के बाद

अपने स्‍थानीय रेडियो केन्‍द्रों का प्रसारण सुनें जहां आपातस्थिति प्रबंधन कर्मचारी, आपके समुदाय और परिस्थिति के लिए सबसे उपयुक्‍त सलाह देंगे।भूकम्‍प के बाद के झटके महसूस करने के लिए तैयार रहें।यदि चोट लगी हो तो अपनी जांच करें और आवश्‍यक होने पर प्राथमिक चिकित्‍सा प्राप्‍त करें। दूसरों की मदद करें यदि आप ऐसा कर सकें।सतर्क रहें कि बिजली आपूर्ति भंग हो सकती है और फायर अलार्म तथा स्प्रिंकलर सिस्‍टम भूकम्‍प के दौरान भवन में काम करना बंद कर सकते हैं चाहे आग न लगी हो। इसकी जांच करें और छोटी-मोटी आग हो तो बुझा दें।यदि आप किसी क्षतिग्रस्‍त भवन में हैं, तो बाहर आने की कोशिश करें और एक सुरक्षित, खुला स्‍थान खोजें। एलिवेटरों के बजाय सीढ़ियों का इस्‍तेमाल करें।बिजली की गिरी हुई लाईनों या टूटी गैस लाईनों का ध्‍यान रखें और क्षतिग्रस्‍त इलाके से बाहर निकल जाएं।आपातकालीन कॉलों के लिए लाईनें खुली रखने के लिए फोन का उपयोग केवल छोटी, जरूरी कॉलों के लिए ही करें।यदि आपको गैस की गंध आती है या आप कोई धमाके या सरसराहट की आवाज़ सुनते हैं, तो एक खिड़की खोलें, हर एक को जल्‍दी से बाहर निकालें और गैस बंद कर दें यदि आप ऐसा कर सकें। यदि आप चिंगारियां निकलती देखें, टूटे हुए तार या बिजली के सिस्‍टम क्षतिग्रस्‍त हो चुके देखें, तो मुख्‍य फ्यूज बॉक्‍स से बिजली आपूर्ति बंद कर दें यदि ऐसा करना सुरक्षित हो।अपने जानवरों को अपने सीधे नियंत्रण में रखें वरना वे बेचैन होकर इधर-उधर भाग सकते हैं। अपने जानवरों को खतरों से बचाने और अन्‍य लोगों को आपके जानवरों से बचाने के उपाय करें।यदि आपकी संपत्ति नष्‍ट हो गई हो, तो बीमा उद्देश्‍यों के लिए इसका विवरण लिखें और फोटो खींच लें। यदि आपकी सम्‍पत्ति किराए की है, तो अपने मकान-मालिक से सम्‍पर्क करें और अपनी संबंधित बीमा कंपनी से सम्‍पर्क करें जितनी जल्‍दी संभव हो सके।

भूकंप (Earthquick) क्या है?

भूकंप धरती की सतह से गहराई में

वैसे अगर हम भूकंप के कारणों की बात करें तो वैज्ञानिक बताते हैं कि धरती या समुद्र के अंदर होने वाली विभिन्न रासायनिक क्रियाओं के कारण ये भूकंप आते हैं। अधिकांश भूकंपों की उत्पत्ति धरती की सतह से 30 से 100 किलोमीटर अंदर होती है। सतह के नीचे धरती की परत ठंडी होने और कम दबाव के कारण भंगुर होती है। ऐसी स्थिति में जब अचानक चट्टानें गिरती हैं तो भूकंप आता है। एक अन्य प्रकार के भूकंप सतह से 100 से 650 किलोमीटर नीचे होते हैं। इतनी गहराई में धरती इतनी गर्म होती है कि सिद्धांतत: चट्टानें द्रव रूप में होनी चाहिए, यानि किसी झटके या टक्कर की कोई संभावना नहीं होनी चाहिए। लेकिन ये चट्टानें भारी दबाव के माहौल में होती हैं। इसलिए यदि इतनी गहराई में भूकंप आए तो निश्चय ही भारी ऊर्जा बाहर निकलेगी।

धरती की सतह से काफ़ी गहराई में उत्पन्न अब तक का सबसे बड़ा भूकंप 1994 में बोलीविया में रिकॉर्ड किया गया। सतह से 600 किलोमीटर दर्ज इस भूकंप की तीव्रता रियेक्टर पैमाने पर 8.3 मापी गई थी। हालाँकि वैज्ञानिक समुदाय का अब भी मानना है कि इतनी गहराई में भूकंप नहीं आने चाहिए क्योंकि चट्टान द्रव रूप में होते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि विभिन्न रासायनिकों क्रियाओं के कारण ये भूकंप आते होंगे। अत्यंत गहराई में आने वाले भूकंपों के बारे में ताज़ा अध्ययन यूनवर्सिटी कॉलेज, लंदन के मिनरल आइस एंड रॉक फिज़िक्स लैबोरेटरी में किया गया है। वैज्ञानिकों ने धरती की सतह के काफ़ी भीतर आने वाले भूंकपों की ही तरह नकली भूकंप प्रयोगशाला में पैदा करने में सफलता पाई है। ऐसे भूकंप आमतौर पर धरती की सतह से सैंकड़ों किलोमीटर अंदर होते हैं, और वैज्ञानिकों की तो यह राय है कि ऐसे भूकंप वास्तव में होते नहीं हैं। वैज्ञानिकों ने इन कथित भूकंपों को प्रयोगशाला में इसलिए पैदा किया कि इसके ज़रिए धरती की अबूझ पहेलियों को समझा जा सके। ताज़ा प्रयोगों से धरती पर आए भीषणतम भूकंपों में से कुछ के बारे में विस्तृत जानकारी मिल सकेगी।

भूकंप के प्रभाव

भूकंप के मुख्य प्रभावों में झटके और भूमि का फटना शामिल हैं, जिससे इमारतों व अन्य कठोर संरचनाओं (जैसे कि बांध, पुल, नाभिकीय उर्जा केंद्र इत्यादि) को कमोबेश नुकसान पहुँचता है लेकिन ये प्रभाव यहाँ तक ही सीमित नहीं हैं। भूकंप, भूस्खलन और हिम स्खलन पैदा कर सकता है, जो पहाड़ी और पर्वतीय इलाकों में क्षति का कारण हो सकता है। भूकंप के कारण, किसी विद्युत लाइन के टूट जाने से आग लग सकती है। भूकंप के कारण मिट्टी द्रवीकरण (Soil liquefaction) हो सकता है जिससे इमारतों और पुलों को नुक्सान पहुँच सकता है। समुद्र के भीतर भूकंप से सुनामी आ सकता है। भूकंप से क्षतिग्रस्त बाँध के कारण बाढ़ आ सकती है। भूकंप से जीवन की हानि, सम्पत्ति की क्षति, मूलभूत आवश्यकताओं की कमी, रोग इत्यादि होता है।

जानवरों पर भूकंप का प्रभाव

जब भूकंप आने को होता है तो पशु-पक्षी कुछ अजीब हरकतें करने लगते हैं। चूहे अपनी बिलों से बाहर आ जाते हैं। अगर यह सही है तो वैज्ञानिक पशु-पक्षियों की इस अद्भुत क्षमता को भूकंप की पूर्व सूचना प्रणाली में क्यों नहीं बदल सकते। अगर ऐसा संभव हो जाए तो प्रकृति की इस तबाही पर विजय पा सकेगा मानव। हालांकि प्रयोगशालाओं में इस पर शोध कर रहे हैं वैज्ञानिक। चूहे भूकंप आने का संकेत दे सकते हैं। जापान के शोधकर्ताओं का कुछ यही मानना है। उन्होंने पाया है कि भूकंप आने से पहले जिस तरह के विद्युत और चुंबकीय क्षेत्र बनते है अगर चूहों को उन क्षेत्रों में रखा जाए तो वे अजीबोगरीब हरकतें करते हैं। ओसाका यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर ताकेशी यागी का कहना है कि चूहों का अजीब व्यवहार उन्होंने आठ साल पहले कोबे में आए भूकंप से एक दिन पहले अपनी प्रयोगशाला में देखा था। इस तरह के व्यवहार से भूकंप के आने का कुछ अंदेशा लगाया जा सकता है। हालाँकि जीव वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तरह की हरकतें एक समान नहीं रहती इसलिए पक्की भविष्यवाणी करना कठिन हो जाता है।

मृदा क्या है ?

मृदा क्या है ?

मृदा पृथ्वी की ऊपरी परत है जो पौधों की वृद्धि के लिए प्राकृतिक माध्यम प्रदान करता है। पृथ्वी की यह ऊपरी परत खनिज कणों तथा जैवांश का एक संकुल मिश्रण है जो कई लाख वर्षो में निर्मित हुआ है तथा इसके बिना इस पृथ्वी पर जीवन का अस्तित्व असंभव है। भूमि के एक अभिन्न संद्यटक के रूप में मृदा जीवन समर्थक तंत्र का एक संघटक है।
भूमि की उपादेयता उसके मृदा की किस्म पर निर्भर है। इस कारण जनसाधारण भूमि तथा मृदा में कोई अंतर नही मानते किन्तु वैज्ञानिक मानते है। किसी वनस्पति विहीन भूमि पर आप मृदा को प्रथम दृष्टया देख सकते है किन्तु किसी सघन वन में इस प्रकार मृदा नही दिखती क्योंकि वहॉ गिरी हुई पत्तियों से मृदा पृष्ठ आच्छादित रहता है।
पौधों की वृद्धि को समर्थित करने के लिए मृदा एक क्रांतिक संसाधन है। विभिन्न खेतों की मृदाए उनकी उत्पत्ति तथा प्रबंधन के अनुसार दृष्य रूप, लक्षणों तथा उत्पादकता में भिन्न-भिन्न हो सकती है किन्तु वे सभी कृषि तथा खाद्य सुरक्षा, वानिकी, पर्यावरण सुरक्षा तथा जीवन की गुणवत्ता में समान महत्वपूर्ण कार्य संपन्न करती है।

मृदा को कृषि की उपयोगिता के दृष्टिकोण से इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है।
“मृदा एक प्राकृतिक पिन्ड है जो चट्टानों के अपक्षय के परिणाम स्वरूप विकसित होती है, जिसके लाक्षणिक भौतिक, रासायनिक एवं जैविक गुण होते है तथा जो पौधों की वृद्धि एवं विकास के लिए माध्यम प्रदान करती है।”

मृदा एक प्राकृतिक त्रि-आयमी पिन्ड है जिसके गुणधर्म तीनों दिशाओं (लम्बाई, चौड़ाई तथा गहराई) में परिवर्तनीय है। मृदा के इस त्रिआयामी रूप को मृदा परिच्छेदिका कहा जाता है। मृदा-परिच्छेदिका उपरी पृष्ठ से लेकर नीचे पैतृक पदार्थ तक सभी संस्तरो सहित एक उर्द्ध्वाधर कटान है। एक पूर्ण विकसित परिपक्व मृदा परिच्छेदिका में तीन खनिज संस्तर होते है : क, ख तथा ग। किसी स्थान पर मृदा की संपूर्ण जानकारी प्राप्त करने हेतु वहाँ पर मृदा परिच्छेदिका का विस्तृत अध्ययन आवश्यक होता है। इसके लिए हमे मृदा का पृष्ठ से नीचे तक एक अनुभाग काटना होगा तथा उसमें विभिन्न परतो का निरीक्षण करना होगा, जिन्हे ''संस्तर'' कहा जाता है। प्रत्येक विकसित मृदा की एक भिन्न परिच्छेदिका लक्षण होते है। मृदा परिच्छेदिकाओं के समानता तथा विषमता के आधार पर उन्हें विभिन्न समूहों में वर्गीकृत किया जाता है।

मृदा पृष्ठ अथवा जुताई परत मृदा परिच्छेदिका का ऊपरी परत है जिसमें पर्याप्त मात्रा में जैवांश होता है तथा यह जैवांश के एकत्र होने से काले रंग का होता है। यह ऊपरी परत ''संस्तर क'' कहलाता है। पृष्ठ मृदा के नीचे की परत में ऊपरी परत से कम जैवांश होता है तथा इसमें प्रायः मृतिका, चूना अथवा लौह यौगिको का एकत्रीकरण होता है। इस मध्यवर्ती परत जिसमें ''संस्तर क'' से निक्षालित सामग्री पुनः निक्षेपित हो जाती है को ''संस्तर ख'' कहा जाता है। मृदा परिच्छेदिका में सबसे नीचे पैतृक सामग्री होती है जिसे ''संस्तर ग'' कहा जाता है।
प्रत्येक संस्तर में मृदा एक समान विकसित हुई है तथा समान लक्षण प्रदर्षित करती है। प्रत्येक संस्तर के विशिष्ट दृष्य लक्षण जैसे कणों का परिमाण तथा आकार, उनका विन्यास, रंग इत्यादि होते है जो एक संस्तर को दूसरे से विभेद करते है।
मृदा परिच्छेदिका का अध्ययन महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मृदा के लाक्षणिक गुणों तथा गुणवत्ता को प्रकट करता है।
मृदा की गहराई अत्यधिक ढलान वाले पहाड़ी पर कुछ सेन्टीमीटर होती है तो जलोढ़ निक्षेपों में यह कई मीटर गहरी हो सकती है।
मृदा निर्माण एक सतत लंबी प्राकृतिक प्रक्रिया है। अनुमानतः पृष्ठ मृदा (15 से.मी. गहरी) के निर्माण में प्राकृति को 3600 से 6000 वर्ष लगते है।